M.L.K PG College Balrampur Uttar Pradesh

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30/12/2025

ये बदहवास सा दिख रहा आदमी कोई कोई बेघर या पागल नहीं हैं बल्की वह एक प्रतिभाशाली जीनियस हैं।

इस तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति हैं ग्रिगोरी पेरलमैन, इस समय के सबसे महान गणितज्ञों में से एक। सेंट पीटर्सबर्ग के मेट्रो में खींचा गया यह फोटो पहली बार देखने कोई पागल या बेघर व्यक्ती लग सकता है। लेकिन इस बेढंगे बाल और साधारण और मैले कपड़ों के पीछे छुपा है वह चमकदार दिमाग जिसने प्रसिद्ध पॉन्केयर अनुमिति (Poincaré Conjecture) का समाधान किया गणित की सबसे कठिन पहेलियों में से एक है।

2006 में, उन्हें उनके समाधान के लिए क्ले मैथमेटिक्स इंस्टिट्यूट द्वारा $1 मिलियन (लगभग 7 करोड़ रुपये) पुरस्कार दिया गया — लेकिन उन्होंने ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया की “अगर समाधान सही है, तो और कोई पहचान जरूरी नहीं।”

पेरलमैन बाद में पूरी तरह से शैक्षणिक दुनिया से दूर चले गए, प्रसिद्धि, पैसा और ध्यान से इंकार कर दिया। ऐसे समय में जब सफलता को अक्सर दौलत और शोहरत से मापा जाता है, उन्होंने चुना सच्चाई, सरलता और मौन को।

उनका क्रेज़ इतना है रूस में युवा लोग उनके चेहरे की प्रिंट वाली टी-शर्ट पहनते हैं जिस पर लिखा होता हैं:
"आप सब कुछ नहीं खरीद सकते।"

उनका जीवन याद दिलाता है:
🌟 असली महानता हमेशा सूट और शाइन में नहीं होती।
🌟 हर प्रतिभाशाली व्यक्ति को ताली की ज़रूरत नहीं होती।
🌟 कभी-कभी सबसे तेज दिमाग सबसे शांत आत्मा में छुपा होता है।

18/09/2025

1950 में, एक युवा माँ ने अपनी पाँच नवजात बेटियों को अपनी बाँहों में थामा। वह कैमरे के लिए मुस्कुराई, लेकिन दिल में छिपे डर को किसी ने नहीं देखा। उसके पति ने तब ही छोड़ दिया था जब उसे पता चला कि वह पाँच बच्चियों की माँ बनने वाली है। उसने कहा कि इतनी ज़िम्मेदारी वह नहीं उठा सकता।

वह अकेली ही बेटियों को पालने लगी—तीन-तीन नौकरियाँ करती, खुद भूखी रहकर बच्चियों को खिलाती, थकान से टूटी हुई होने पर भी हिम्मत का नकाब पहने रहती। लोग कहते थे कि वह असफल हो जाएगी, लेकिन उसने कभी अपनी बेटियों का हाथ नहीं छोड़ा।

सालों बाद, वे बेटियाँ मज़बूत और प्यार करने वाली महिलाएँ बन गईं। उन्हें कभी नहीं भूला कि कैसे उनकी माँ रातों में चुपचाप रोती थी जबकि वे सोने का नाटक करती थीं। उन्हें यह भी याद रहा कि माँ ने अपने सारे सपने छोड़ दिए ताकि वे अपने सपनों के पीछे भाग सकें।

अपने 90वें जन्मदिन पर, बेटियों ने माँ को फूलों और केक से सरप्राइज़ दिया। उसने अपनी पाँच बेटियों को अपने चारों ओर देखा—हर एक अब खुद एक माँ थी—और आँसुओं के बीच फुसफुसाई:

“मेरे पास तुम्हें देने को बहुत कुछ नहीं था… लेकिन मैंने तुम्हें अपनी ज़िंदगी दी। और आज जब तुम सब मेरे सामने खड़ी हो… तो लगता है यह सब कुछ इसके लायक था।”

उन्होंने उसे कसकर गले लगाया, यह जानते हुए कि शायद यह उनका आखिरी जन्मदिन होगा माँ के साथ।

जब मोमबत्तियाँ टिमटिमाईं, तब उन्हें एहसास हुआ कि सबसे बड़ी मोहब्बत की कहानी न तो किताबों में थी और न ही फिल्मों में—
वह लिखी गई थी उनकी माँ की कुर्बानी में।

17/07/2025
10/06/2025

मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध तराई के ऑक्सफोर्ड MLK PG COLLEGE बलरामपुर में दिनांक 8/07/25 प्रवेश की प्रक्रिया प्रारंभ हो रही है
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प्रवेश हेतु अधिक जानकारी के लिए महाविद्यालय में प्रवेश संबंधी काउंटर से संपर्क करें
ऑनलाइन प्रवेश हेतु महाविद्यालय की वेबसाइट पर लॉग इन करें
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29/05/2025

दिल्ली पुलिस के ASI निर्देश पंवार (38) और ASI राजदीप (35) के लिए ये काम सिर्फ एक ड्यूटी नहीं, बल्कि एक मिशन है — ऐसा मिशन जिसमें हर आंसू सूखता है और हर मां की ममता फिर से मुस्कुराती है।

इन दोनों पुलिसकर्मियों ने पिछले 11 महीनों में 223 लापता बच्चों को उनके परिवारों से मिलाया। ये बच्चे कहीं से भी हो सकते थे — दिल्ली की गलियों से लेकर जम्मू, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पंजाब, राजस्थान और हरियाणा तक।

कभी सिर्फ एक पुरानी धुंधली फोटो, कभी एक नाम… और कई बार कोई सुराग भी नहीं। लेकिन दोनों ने हार नहीं मानी। हर सुबह 6 बजे से CCTNS और ZIPNET जैसे नेशनल डाटाबेस स्कैन करना शुरू करते, FIR पढ़ते, केस चुनते, परिवारों से संपर्क करते और उन शहरों तक पहुंच जाते जहां उम्मीद की एक हल्की किरण भी दिखती।

सोशल मीडिया की तस्वीरों में कोई बैकग्राउंड, CCTV में किसी का चेहरा, या फोन का एक लोकेशन पिंग – इन मामूली सुरागों को जोड़ते हुए दोनों ने वो कर दिखाया जो असंभव लगता था।
एक 14 साल की लड़की का केस उन्हें जम्मू तक ले गया — सिर्फ एक ट्रेन बोर्डिंग की जानकारी थी। लेकिन सुबह 7 बजे जब स्टेशन पहुंचे, तो वो लड़की एक बेंच पर अकेली बैठी मिली। उसी दिन माता-पिता से मिलवा दिया।

एक और मामला – 2017 में लापता हुई 15 वर्षीय लड़की को 7 साल बाद सहारनपुर, यूपी से ढूंढ़ निकाला। अब वो 22 साल की है, और परिवार को उम्मीद नहीं थी कि वो कभी लौटेगी।
इन दोनों की मेहनत और संकल्प को देखते हुए इन्हें आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन दिया गया — पहले हेड कांस्टेबल थे, अब ASI बन चुके हैं।
राजदीप ने 112 और पंवार ने 111 बच्चों को बचाया है।
इनकी टीम दिल्ली के 70 से अधिक थानों में काम करती है, और हर केस में एक ही लक्ष्य रहता है — बच्चे को सही-सलामत उसके परिवार तक पहुंचाना।

ASI पंवार कहते हैं:
"बहुत बार ऐसा होता है कि FIR में फोन नंबर बंद मिलते हैं, या परिवार कहीं और शिफ्ट हो चुका होता है। भाषा भी एक चुनौती बनती है। लेकिन जब वो बच्चा फिर मां की गोद में होता है… तो हर थकान मिट जाती है।"

यह सिर्फ बच्चों की वापसी नहीं है, ये भरोसे की वापसी है।

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