Hindi/Sanskrit Learning

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21/06/2026

ॐ....
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
अर्थ -
योग चित्त (मन) की वृत्तियों (विचारों और चंचलता) को रोकता है।
भावार्थ -
मित्रों! महर्षि पतंजलि द्वारा दिये गये प्रस्तुत योग सूत्र को हम चार शब्दों के द्वारा समझ सकते हैं। योग, चित्त, वृत्ति और निरोध । योग अर्थात जुड़ना, चित्त अर्थात मन, वृत्ति अर्थात विचार, निरोध अर्थात नियंत्रण।जब हम अपने विचारों को अपने नियंत्रण में कर लेते हैं तो हम अपने आप से जुड़ जाते हैं।
मित्रों! योग एक मानसिक अभ्यास है जिसमें हम स्वयं से जुड़ते हैं। हमारा मन लगातार इच्छाओं, भावनाओं तथा विचारों में भटकता रहता है।यह मानसिक हलचल ही हमारे दुःखों का, तनाव का कारण है। हम विभिन्न आसनों , प्राणायाम तथा ध्यान से अपने मन को शांत कर लेते हैं, तब हम अपने वास्तविक रूप को पहचानते हैं। यह अपने रूप को पहचानना ही आत्म ज्ञान या मोक्ष है।
मित्रों! महर्षि पतंजलि ने मन की तुलना एक गहरी, शांत झील से की है। जब झील में पत्थर फेंका जाता है तो लहरें (वृत्तियाँ) उठती हैं और पानी साफ नहीं दिखताअर्थात मनुष्य स्वयं को साफ नहीं देख पाता। ऐसे में मनुष्य प्राणायाम और योग आसनों द्वारा अपने मन के विचारों की उथल-पुथल को शांत कर लेता है, तब वह अपने वास्तविक रूप को देख पाता है, अपने आप से जुड़ जाता है और मन के शांत होने पर सुखी हो जाता है।
मित्रों! आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर हम महर्षि पतञ्जलि को नमन करते हैं।

योगेन चित्तस्य पदेन वाचा मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलिं प्रांजलिरानतोऽस्मि।।

अर्थात मन की शुद्धि के लिये 'योग सूत्र', वाणी की शुद्धि के लिये व्याकरण 'महाभाष्य' और शरीर की शुद्धि के लिये वैद्यशास्त्र "चरक संहिता" दी है।(जिन्होंने इस प्रकार तीनों स्तरों पर हमारे अज्ञान व विकारों को दूर किया है )ऐसे मुनियों में श्रेष्ठ महर्षि पतंजलि को मेरा नमस्कार है।
मित्रों! आज योग दिवस पर हम ये प्रण ले कि अपने अच्छे स्वास्थ्य और सुख प्राप्ति हेतु प्रतिदिन अपने मन को वश में रखने के लिये योग के नियमों का पालन करेंगे।
ॐ शांति ॐ....

14/06/2026

ॐ....
सर्व परवशं दुःखं, सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
अर्थ .....
दूसरों के वश में (परतंत्रता में) सब दुःख होते हैं, अपने वश में (स्वतंत्रता में) सब सुख होते हैं। यही संक्षेप में सुख-दुःख के लक्षण जानने चाहिए।
भावार्थ.....
मित्रो! ! परतंत्रता मतलब दुःख और स्वतंत्रता मतलब सुख। जब हम किसी दूसरे के वश में होते हैं अर्थात उसके आधीन होते हैं, उसके नियन्त्रण में होते हैं, परतन्त्र होते हैं तो उस स्थिति में हम कभी भी सुखी नहीं हो सकते। क्योंकि हम उसकी इच्छाओं के दास हो जाते हैं जैसा वह हमें करने के लिये कहता है हमें करना पड़ता है। तो हम ऐसी स्थिति आने ही क्यों दें। क्यों किसी के हाथ में अपना नियन्त्रण दें। अपने विचारों पर भी किसी का नियन्त्रण क्यों हो?
मित्रों! आज की भाग दौड़ की ज़िन्दगी में हम गुलाम हैं अपने काम के। हमारी कम्पनी, हमारा बॉस, हमारा काम यह तय करता है कि हम अपनी ज़िन्दगी को कैसे जियें। बस यही सबसे बड़ा दुःख का कारण है। हम अपनी रुचियों को भूल कर, जिससे हमें ख़ुशी मिलती है, हर समय काम के बोझ से दबे रहते हैं तो ऐसी स्थिति में ख़ुशी कहाँ? काम करें किन्तु एक सन्तुलन के साथ। आप काम के आधीन न हों बल्कि काम आपके आधीन हो।
इसी प्रकार बहुत बार हमारी सोच पर किसी और का नियन्त्रण हो जाता है। आजकल सोशल मीडिया का जमाना है, जो सबको अच्छा लगता है जिस पोस्ट पर ज्यादा लाइक मिलते हैं हम वही करना शुरू कर देते हैं मतलब हमारी सोच, हमारी खुशी दूसरों के अनुसार चालित होती है। हमारी अपनी इच्छा नहीं होती बल्कि जो सबको अच्छा लगता है जिस पर ज़्यादा लाइक मिलते हैं हम वही करना शुरू कर देते हैं।तो मित्रों! इससे हमारी सोच पर भी दूसरों का नियन्त्रण हो गया जिसके कारण व्यक्ति गहरे अवसाद तक में चला जाता है और बहुत बार तो आत्महत्या तक कर लेता है।
इसी प्रकार हम बहुत बार अपने काम के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं और जब हमारा वह काम समय पर नहीं होता या हमारे मन के अनुसार नहीं होता, हम तब भी दुःखी हो जाते हैं। इसलिए कहा गया है "अपना काम स्वयं करो"।
मित्रों ! स्वतन्त्रता के बिना संसार की भौतिक सुख सुविधाएँ भी किसी काम की नहीं होती। इसलिए अपने बॉस स्वयं बनो अपनी सोच पर अपना नियन्त्रण रखो और सदैव प्रसन्न रहते हुए सांसारिक सुखों का भोग करो।
...ॐ शान्ति ॐ....

01/06/2026

ॐ......
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात सत्यमप्रियम् ।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात, एष धर्मः सनातनः ॥
अर्थ -
(हमेशा) सत्य बोलना चाहिये, प्रिय बोलना चाहिये। अप्रिय (कड़वा) सत्य नहीं बोलना चाहिये। प्रिय (मीठा) झूठ नहीं बोलना चाहिये। यही सनातन धर्म है।

भावार्थ -
मित्रो! हमारे ग्रन्थों में हमारे मनीषियों ने जिन्दगी को व्यावहारिक ढंग से कैसे जियें यह बताया है। इसमें बताया है कि हमेशा सत्य ही बोलना चाहिये किन्तु सत्य कैसा, जो सबको प्रिय लगे अर्थात सत्य बोलते समय भी विनम्रता रखनी चाहिये। ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिये कि जिससे किसी की भावनाएँ आहत हों। जैसे किसी अंधे व्यक्ति को 'अन्धा' कह कर उसकी कमी का एहसास नहीं कराना चाहिये। ऐसा बोलना कटु सत्य बोलना है। किसी की कमज़ोरी को बार-बार उससे कह कर उसे नीचा नहीं दिखाना चाहिये। इसी प्रकार किसी की चाटुकारिता करने के लिये उसके सामने ऐसा झूठ जो उसे प्रिय लगे, नहीं बोलना चाहिये। मित्रों! किसी को खुश करने के लिये मीठा झूठ न बोलें, और किसी को नीचा दिखाने के लिए कड़वा सच न बोलें। बल्कि किसी में कोई कमी है तो उसे दूर करने का प्रयास करें तभी सच्ची मानवता होगी और दूसरों को प्रिय लगे ऐसा झूठ बोलेंगे तो उस व्यक्ति की कभी उन्नति नहीं होगी। इसीलिए यही व्यवहार का सामंजस्य है। यही सनातन धर्म है जो हमें सच्चा इंसान बनाता है।
...ॐ शान्ति ॐ....

24/05/2026

ॐ..
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु॥

अर्थ......
(हे परमात्मा) जागृत अवस्था में जो मन दूर-दूर तक चला जाता है और सोते हुए भी यह मन दूर तक चला जाता है। वही (मन ही हमारी) इन्द्रियों का प्रकाशक (चलाने वाला) है ऐसा हमारा मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो।

भावार्थ.....
मित्रों! हमारा ये मन बहुत चंचल है। इसकी गति वायु से भी अधिक तेज है। यह हमेशा कहीं न कहीं घूमता रहता है। यह हमारे शरीर में रहता है किन्तु मन में उठे विचार कहीं भी भ्रमण कर सकते हैं। मन से ही हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ अर्थात, नाक, कान, आँख, जिह्वा तथा त्वचा, ज्ञान ग्रहण करती हैं। हमारी वाक् इन्द्रिय वही बोलती है जो हमारा मन कहता है। इसी प्रकार आँखें वही देखती हैं जो हमारा मन चाहता है, नहीं तो उधर से हम नजरें मोड़ लेते हैं। जो महक हमारे मन को अच्छी लगती है उसे ही हम बार-बार सूंघना चाहते हैं। कानों को जो बात या संगीत अच्छा लगता है हम वही सुनते रहते हैं। इसी प्रकार कर्मेन्द्रियाँ अर्थात हाथ, पैर आदि भी मन के आधीन हैं। मित्रों! इस दुनिया में हम जो भी कार्य करते हैं वह हमारे शरीर द्वारा नहीं मन द्वारा किया जाता है। मन को छठी इन्द्रिय कहा जाता है। यही वह इन्द्रिय है जो अन्य सब इन्द्रियों को चलाती है। इसीलिये हम भगवान से प्रार्थना करते हैं हमारा मन श्रेष्ठ तथा कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो। हमारा मन सदा अच्छे मार्ग पर चलकर हमारे जीवन को सही दिशा में चलाता रहे।
ॐ शान्ति ॐ..

19/05/2026

ॐ...
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद्, वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः, क्षीणो वृत्ततस्तु हतोहतः॥
अर्थ......
(व्यक्ति को) अपने चरित्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। धन तो आता है, जाता है। यदि धन नष्ट हो जाये तो (मनुष्य का) कुछ नष्ट नहीं होता किंतु यदि चरित्र नष्ट हो जाये तो (मनुष्य का) सब कुछ नष्ट हो जाता है।
भावार्थ....
मित्रो! मनुस्मृति में चरित्र को ही सब कुछ माना गया है। चरित्र अर्थात अच्छा आचरण और नैतिकता का पालन।चरित्र और धन में तुलना की जाए तो धन नश्वर है, कुछ नहीं है। चरित्र व्यक्ति को अमर बना देता है।किन्तु आजकल धन को ही सब कुछ मान लिया गया है। उसी व्यक्ति को सब पूजते हैं जिसके पास धन हो। जबकि धन तो कभी किसी के पास टिक कर नहीं रहता। किंतु यदि किसी व्यक्ति का चरित्र एक बार अच्छा बन गया तो वह सदा के लिये रहता है। चरित्रवान व्यक्ति ही समाज, देश के लिये मूल्यवान है। वह अपने साथ सबका चरित्र उन्नत करेगा जो समाज व देश की उन्नति में सहायक होगा। मित्रो! आजकल तो चरित्रहीनता बढ़ती ही जा रही है जिससे व्यक्ति का, समाज व देश का पतन निश्चित है। अपने चरित्र को संभाल कर रखना चाहिये। धन यदि चला भी जाये तो उसे फिर से कमा सकते हैं किन्तु चरित्रहीन होने पर सब कुछ नष्ट हो जाता है। मनुष्य के पतन के बाद उसका उत्थान मुश्किल हो जाता है। इसलिये चरित्र की महत्ता को समझ कर उसे संभालना चाहिये।
..ॐ शांति ॐ...

17/05/2026

ॐ...
उदेति सविता ताम्रस्, ताम्र एवास्तमेति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।।
अर्थ.....
सूर्य उदय होते समय भी लाल रंग का होता है और अस्त होते समय भी लाल ही होता है। उसी प्रकार महापुरुष सुख हो दुःख दोनों ही परिस्थितियों में एक समान रहते हैं।
भावार्थ.....
मित्रों! हमारे मनीषियों ने हमें बहुत ही सरल तरीके से ज़िन्दगी जीने का तरीका बताया है। जिसे हम या तो पढ़ ही नहीं पाये या पढ़ा है तो समझ नहीं पाये या अपने जीवन में आत्मसात नहीं कर पाये। और इस संसार में सुख, दुःख की नदी में गोते लगा रहे हैं। प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखाती है। सूर्य देव जो हमारे जीवन दाता हैं उनके माध्यम से बताया है कि सूर्य उदय होते समय और अस्त होते समय लाल रंग का होता है। इसी प्रकार महान या चित्त में स्थिर व्यक्ति का जब भाग्य उदय होता है अर्थात उसके पास सुख सम्पत्ति आ जाती है तब वह अपने भाग्य पर घमण्ड नहीं करता ,बहुत ज्यादा खुश नहीं होता इसी प्रकार जब उसके भाग्य का अस्त होता है अर्थात उसके पास वह वैभव, सम्पत्ति तथा सुख नहीं रहते तब भी वह परेशान नहीं होता, निष्काम भाव से अपना कर्म करता है। मित्रों! जिस प्रकार दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आना निश्चित है उसी प्रकार सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का आना निश्चित ही है। इसलिये हमें विचलित होने की आवश्यकता नहीं है। यदि हम समभाव से अपना कार्य करते रहेंगे तो हमारा जीवन सदा सुखी रहेगा।
.ॐ शान्ति ॐ...

10/05/2026

ॐ...
नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गति:।
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया।।
अर्थ-
माता के समान कोई छाया(सुरक्षा)नहीं है। माता के समान कोई गति (सहारा)नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है। न ही माता के समान कोई प्रिय वस्तु है।
भावार्थ -
मित्रों! आज अंग्रेजी मातृ दिवस है। आज के दिन माँ को याद कर लेते हैं उसे अपनी शुभकामनाये दे देते हैं और अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेते हैं। मित्रों! माता-पिता ही हैं जिनका ऋण हम कभी नहीं उतार सकते हैं क्योंकि ये ही हैं जिनके कारण हमारा अस्तित्व है। हम आज जो कुछ भी हैं उनके संस्कार, मेहनत और उनके निस्वार्थ त्याग और प्यार के कारण ही हैं।एक माता-पिता ही होते हैं जो अपने बच्चे को अपने से ज्यादा सफल होते हुए देखना चाहते है। अपने हर सुख-दुःख से ज्यादा अपने बच्चे के बारे में सोचते हैं। अपने आपको कष्ट देकर भी अपने बच्चों को सुख देते हैं। एक बच्चा अपने माता-पिता के आस-पास रहकर ही अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। मित्रों! आज हम चाहे जितने बड़े हो जाये पर अपने माता-पिता से बड़े कभी नहीं हो सकते। उनके अनुभव की बराबरी कभी नहीं कर सकते इसलिये उनके महत्व के एहसास को महसूस करें। उनकी जितनी हो सके सेवा करें। क्योंकि उनके जाने के बाद आपके पास सब कुछ होगा, नहीं होगा तो आपको रोकने, टोकने वाला कोई नहीं होगा। एक ऐसा डांटने वाला नहीं होगा जिसकी डांट में भी निस्वार्थ प्रेम हो।
....ॐ शान्ति ॐ.....

09/05/2026

ॐ.....
जाड्यं धियो हरति, सिञ्चति वाचि सत्यम्,
मानोन्नतिं दिशति, पापमपा करोति।
चेतः प्रसादयति, दिक्षु तनोति कीर्तिम् ,
सत्सङ्गति कथय किं न करोति पुंसाम्।।
अर्थ:-
(अच्छे मित्रों की संगति) बुद्धि की जड़ता को दूर करती है, वाणी में सत्य का संचार करती है, मान और उन्नति को बढ़ाती है, पाप से मुक्त कराती है, मन को प्रसन्न रखती है, दिशाओं में कीर्ति को फैलाती है, (अब आप) कहिये सत्संगति मनुष्य का कौन सा भला नहीं करती।

भावार्थ :-
मित्रों, आज के समय में जब चारों ओर छल-कपट और पाप बढ़ता ही जा रहा है तब सत्संगति ही मनुष्य को बुरे रास्ते से हटा कर अच्छी राह पर ला सकती है। सत्संगति अर्थात अच्छा मित्र। एक सच्चे मित्र में ही ये शक्ति और कला होती है कि वह अपने मित्र की बुद्धि को सही दिशा दिखाए।जब बुद्धि सही दिशा में चलती है तो मनुष्य सच बोलता है और सही काम करता है, पाप से दूर हो जाता है, जिससे उसका चारों दिशाओं में मान-सम्मान बढ़ता है और व्यक्ति प्रसन्न रहने लगता है। प्रसन्न रहना ही तो मनुष्य की पहली आवश्यकता है। मित्रों! इसका सार यही है कि मनुष्य की बुद्धि सदा सही मार्ग पर चलनी चाहिए और वह एक सच्चा मित्र ही कर सकता है। सच्चा मित्र कभी चापलूसी नहीं करेगा अपने मित्र को सही-गलत का रास्ता दिखायेगा। बस यही जीवन में सफलता तथा खुश रहने का रास्ता है। अपनी संगति सदा अच्छी रखें चापलूसों से सदा दूर रहे।
....ॐ शांति ॐ ....

23/04/2026

ॐ......
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद् भद्रं तन्न आसुव।।

​अर्थ -
हे सब सुखों के दाता सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता आप हमारे सब दुर्गुणों, दुर्व्यसनों तथा दुखों को दूर कीजिये तथा जो कल्याणकारी और सुखकारी पदार्थ हैं उन्हें हमें प्राप्त कराइये।
​भावार्थ -
मित्रों! यह मंत्र यजुर्वेद से लिया गया है। प्रतिदिन उपासना करने के लिये है। इससे नकारात्मकता दूर होती है तथा जीवन में सकारात्मकता आती है। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हमारे जीवन में जो कुछ भी बुरा है, जो त्याज्य है, जिसका त्याग करना आवश्यक है, जैसे अशांति, बुरी आदतें, और दुःख, उन सबको हमें अपने जीवन से दूर करना है तथा जो कुछ भी ग्रहण करने, अपनाने योग्य है जैसे शांति, अच्छी आदतें तथा सुख, वह हमें प्रदान कीजिये। मित्रों! यदि हम अपने जीवन में शान्ति तथा सुख चाहते है तो वह हमारे अन्दर ही होता है। हमें अपने कर्म ऐसे रखने चाहिये जिनको करके हमारे मन को शान्ति मिले। इसके अतिरिक्त हम ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी देते हैं वही हमारे पास लौट कर आता है। यदि हम संसार में शान्ति और खुशियाँ बाटेंगे तो वही हमारे पास लौट कर आयेगी यही परावर्तन का नियम है। मित्रों! यदि प्रतिदिन हम ब्रह्माण्ड में हम यही भावना भेजेंगे तो हमें अच्छा बनने से और सुखी बनने से कोई नहीं रोक सकता।
...ॐ शान्ति ॐ....

13/03/2026

ॐ....
गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति,ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषा:।
सुस्वादुतोया: प्रभवन्ति नद्यः,समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेया:।।
अर्थ....
कोई भी गुण, गुणी(अच्छे व्यक्ति) के पास पहुंच कर गुण हो जाते हैं और वही गुण निर्गुण के पास पहुंच कर दोष बन जाते हैं।जिस प्रकार नदी का अपने प्रादुर्भाव के समय पानी मीठा रहता है, पर जब वे समुद्र में मिल जाती हैं तो उनका पानी पीने योग्य नहीं रह जाता।
भावार्थ....
मित्रों !! हम सब अपने जन्म के समय निर्मल मन होते हैं, गुणों की खान होते हैं। हमे जैसा संग मिलेगा, जैसा सिखाया जाएगा हम वैसे ही बन जाएंगे। इसलिए हमारा प्रयत्न होना चाहिए कि हमें अच्छे गुरु मिले ताकि अच्छे गुणी शिक्षक से मिल कर हमारे गुण और अधिक निखर कर आएंगे पर यदि हमारी संगति खराब होगी, हमें खराब लोगों का साथ मिलेगा तो हमारे सारे गुण दोषों में परिवर्तित हो जाएंगे और हमारी गिनती भी उन्हीं लोगों जैसी होगी। जिस प्रकार गंगा नदी अपने प्रादुर्भाव के समय निर्मल होती है पवित्र होती है यदि उसमें कोई और नदी भी मिलती है तो उस नदी की भी गुणवत्ता बढ़ जाती है पर जब वही गंगा नदी समुद्र में मिल जाती है तो उसका जल पीने योग्य नहीं रह जाता। मित्रों.... अपनी गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए सदा गुणी लोगों का साथ ढूंढना चाहिए।
..ॐ शांति ॐ....

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