किसी को शिक्षा देने या प्राप्त करने से पहले शिक्षार्थी को शिक्षा ग्रहण करने हेतु तैयार किया जाना चाहिए।
प्राचीन शिक्षा पद्धति में गुरु सभी शिक्षार्थियों को शिक्षा देने से पहले उपनयन संस्कार कराते थें और बच्चा ब्रह्मचर्य आश्रम में होता था। मतलब काम क्रोध मोह लोभ से विरत.. ज्ञान प्राप्ति के लिए तैयार होता था।
शायद इसलिए वर्णाश्रम व्यवस्था में सभी को प्रत्येक ज्ञान प्राप्त करने से निषेध था। जो विद्यार्थी अपने को जिस ज्ञान को प्राप्त करने योग्य बनाता उस ज्ञान का अर्जन कर उस वर्ण का कार्य उच्च आदर्शों के साथ संपादित करता।
तंत्र विद्या में शायद आज भी यह प्रक्रिया अपनाई जाती है।
आधुनिक शिक्षा पद्धति में हम शिक्षार्थी को ज्ञान(जानकारी) तो दे रहें हैं लेकिन क्या उसे उस ज्ञान को धारण करने योग्य बना पा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो आज समाज के सर्वोच्च पद/उपाधि धारित करने वाले भ्रष्टाचार, आतंक, चरित्रहीन नहीं होते।
"शिक्षा का सही उपयोग एक अत्यंत जिम्मेदारी और सतर्कता का कार्य है।"🙏🙏🙏
एक विचार...
Jalkshatriy Swati
समंदर की गहरी मल्लाहो से पूछो किनारे बैठने वाले तो बस पत्थर फेंकते हैं।
#मल्लाह ब्रांड
25/04/2026
Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Sadam Hussain, Rinku Kumari Gautamf Rinku
20/04/2026
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जीवन में कुछ संबंध ऐसे होते है जो किसी पद प्रतिष्ठा के मोहताज नहीं होते…!
वे स्नेह और विश्वास की बुनियाद पर टिके होते है.
17/06/2023
अयोध्या नगरी ने बदलाव तमाम देखें हैं
वन को जाते और वन से आते राम देखें हैं
भव्य मंदिर बनाने के लिए न्याय लड़ते राम भक्त
और न्याय के विजई होते हर परिणाम देखे हैं.
🚩🚩
अयोध्यावासी 🚩
14/06/2023
अक्सर कच्चे मकानों में पक्के इरादे पलते हैं,
वह नंगे पांव होकर भी जूतो से आगे चलते हैं.
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Mirzapur Nimauli Bharatkund Bhadarsa
Ayodhya
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