राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा दी गई नकारात्मक फाइनल रिपोर्ट को केवल विरोध याचिका (protest petition) के आधार पर सीधे खारिज नहीं कर सकते। यदि मजिस्ट्रेट फाइनल रिपोर्ट को अस्वीकार करना चाहते हैं, तो उन्हें पुलिस रिपोर्ट, बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करके कारण बताना होगा। SB Criminal Misc. Petition No. 2195/14; Rajasthan High Court on 10/05/2026.
Vipin Poria Advocate
Advocate at Supreme Court of India -3rd Generation Lawyer- Religion Const. of India. Mob. 9312159058
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निचली अदालतें (Trial Courts) किसी डॉक्टर को चिकित्सा लापरवाही (Medical Negligence) के मामले में बिना विशेषज्ञ की राय (Expert Opinion) का इंतजार किए सीधे तौर पर समन (Summon) जारी नहीं कर सकतीं। Rohit Lalit VS. Sourabh Chabbra; Punjab & Haryana High Court on 05/06/2026.
कर्नाटक हाईकोर्ट के अनुसार, चेक बाउंस (Section 138 of NI Act) के मामलों में जुर्माना (fine) या मुआवजा न भरने की सूरत में (डिफ़ॉल्ट सजा के रूप में) किसी भी व्यक्ति को 6 महीने से ज्यादा जेल में नहीं रखा जा सकता।
जुर्माना न भरने की डिफ़ॉल्ट सजा: कानून के तहत, यदि कोई व्यक्ति जुर्माना नहीं भर पाता है, तो उसे दी जाने वाली सजा मुख्य सजा (2 साल) के 1/4 (एक-चौथाई) से अधिक नहीं हो सकती। जेल का मकसद: अदालत ने स्पष्ट किया है कि जुर्माना न भरने पर दी जाने वाली जेल की सजा (default imprisonment) कोई अतिरिक्त सजा नहीं है, बल्कि जुर्माना वसूलने का एक दबाव (coercive tool) मात्र है।
हालांकि शिकायतकर्ता के पास अभी भी दीवानी अदालतों (civil courts) के माध्यम से अपना पैसा वसूलने का कानूनी अधिकार सुरक्षित रहता है।
Dinesh Malpani And State of Karnataka; Karnataka High Court on 04/06/2026.
यदि पीड़ित (Victim) या शिकायतकर्ता को सुनवाई की सूचना (Notice) विधिवत रूप से दी जा चुकी है और वे इसके बावजूद उपस्थित नहीं होते हैं, तो न्यायालय उनकी अनुपस्थिति में सुनवाई कर सकता है। Umesh Mali VS. State of UP; Allahabad High Court.
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के अनुसार, यदि आरोपी चेक पर अपने हस्ताक्षर (Signatures) स्वीकार करता है, तो NI Act की धारा 139 के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में कानूनी उपधारणा (Statutory Presumption) लागू हो जाती है। इस उपधारणा को खंडन करने के लिए केवल यह दावा काफी नहीं है कि चेक एक ‘ब्लैंक सिक्योरिटी चेक’ (Blank Security Cheque) था।
हस्ताक्षर की स्वीकृति (Admission of Signature): यदि आरोपी चेक पर अपने हस्ताक्षर मान लेता है, तो अदालत यह मानकर चलती है कि चेक किसी कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण (Legally Enforceable Debt) को चुकाने के लिए दिया गया था। Narender Kumar VS. State of Haryana; Punjab & Haryana High Court on 25/05/2026.
झूठी FIR आपके ऊपर दर्ज करायी गई है। कराने वाले पर क्या कर सकते हैं?
1) File Complaint of Malicious Prosecution under section 248 BNS (Complaint Case)
2) Extortion अगर किया है तो उसकी FIR दर्ज करा सकते हैं (under section 308 BNS)
3) फोटो वीडियो वायरल करने की धमकी देता है या देती है तो क्रिमिनल या सिविल डेफमेशन (Defamation) का केस करा सकते हैं।
4) Last and Important हाईकोर्ट से FIR रद्द (Quashing u/s 528 BNSS) चार्जशीट से पहले या बाद में रिवीजन में केस रद्द करा सकते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के अनुसार, मौखिक उपहार (Oral Gift) द्वारा अचल संपत्ति (Immovable Property) के स्वामित्व का अधिकार कानूनी रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
कानूनी आवश्यकता: संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1881 (Transfer of Property Act) की धारा 123 के तहत अचल संपत्ति का कोई भी उपहार (Gift) वैध तभी माना जाता है, जब उसे एक लिखित और पंजीकृत दस्तावेज (Registered Instrument) के माध्यम से निष्पादित किया गया हो। Anil Kumar Gupta VS. Laxmi Devi; Delhi High Court on 29/05/2026.
गुवाहाटी हाईकोर्ट (Gauhati High Court) ने स्पष्ट किया है कि केवल जमाबंदी (Jamabandi) या चिट्ठा (Chitha) में नाम दर्ज होने मात्र से किसी व्यक्ति को उस संपत्ति पर मालिकाना हक (Ownership Right) नहीं मिल जाता।
On The Death of MD. Murad Imam, His Legal Heirs VS. On The Death of Md. Suleman Sheikh, His Legal Heirs. Gauhati High Court on 04/06/2026.
अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment): हत्या या साजिश का आरोप होने पर आश्रित को मिलने वाली ‘सरकारी नौकरी’ नहीं रोकी जा सकती।कोर्ट के अनुसार, दया के आधार पर नियुक्ति का दावा आर्थिक सहायता के नियमों से अलग होता है। Atul Chauhan VS. State of Haryana; Supreme Court on 11/06/2026.
केरल हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि आपराधिक पृष्ठभूमि (criminal antecedents) का सत्यापन करते समय पुलिस यह तय नहीं कर सकती कि कोई उम्मीदवार नौकरी के लिए योग्य (suitable) है या नहीं।न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस का काम केवल आवेदक के पूर्व रिकॉर्ड का विवरण देना है, जबकि नौकरी देने या न देने का अंतिम निर्णय केवल नियोक्ता (employer) का होता है। Midhun M. VS. Hindustan Latex Limited Life Care Ltd. Kerala High Court on 26/05/2026.
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