19/04/2026
Heartfelt congratulations to everyone on the sacred birth anniversary of Lord Parashuram Ji, the sixth incarnation of Lord Vishnu. He represents sacrifice, courage, and the protection of righteousness. His life teaches us to stand strong for truth, justice, and against wrongdoing.
let us remember the powerful lessons from his life:
• Always stand for truth and justice, no matter how difficult the situation
• Be fearless and courageous in protecting righteousness
• Respect your parents, teachers, and values
• Use strength and knowledge for the welfare of society, not for ego
• Stay disciplined and committed to your duties
Lord Parshuram Ji’s life teaches us that true power lies in self-control, courage, and dharma.
14/04/2026
आज विश्व के महानतम ज्योतिषाचार्य, खगोलविद और गणितज्ञ आर्यभट्ट जी की जयंती है।
आज विज्ञान और गणित जिस ऊँचाई पर खड़े हैं, उसमें उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने मानवता को ज्ञान, तर्क और विज्ञान की दिशा दिखाई।
आचार्य आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध रचना आर्यभटीय में बीजगणित, अंकगणित और त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किए।
उन्होंने पाई (π) का मान दशमलव के पाँच अंकों तक सटीक बताया और “साइन” (ज्या) की अवधारणा दी, जो आज भी गणित और विज्ञान की नींव है।
उन्होंने हजारों वर्ष पहले यह सिद्ध कर दिया था कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं है, बल्कि सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है।
आचार्य आर्यभट्ट ने वर्ष की अवधि का सटीक अनुमान (365.2951 दिन) भी बताया, जो उनकी अद्भुत वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है।
ऐसे महान विद्वानों की विरासत पर हमें गर्व होना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि हम उनके ज्ञान, विज्ञान और सोच को आगे बढ़ाएं।
आचार्य आर्यभट्ट जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन
10/03/2026
भगवान परशुराम की कहानी सैनिक ब्राह्मणों के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा है, जो उन्हें न्याय और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है उनकी वीरता और बुद्धिमत्ता ने उन्हें एक महान योद्धा बनाया।
जय परशुराम 🙏
30/11/2025
चित्र 1870 का है...
बनारस में पंडित जी विभिन्न वर्गों के बच्चों को भूमि पर लिखवा कर अक्षर ज्ञान करा रहे हैं।
आप स्वयं चिंतन करें कि जिस जातिगत शोषण को हम पढ़ते हैं वह वास्तविक था या वह भारतीय समाज की एकता को छिन्न भिन्न करने का अंग्रेजों का एक षड़यंत्र?
17/10/2025
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते।
विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते॥
- (अत्रिसंहिता, श्लोकः १४०)
ब्राह्मणकुल में उत्पन्न हाेने वाला जन्म से ही 'ब्राह्मण' कहलाता है।
उपनयन संस्कार हाे जाने पर 'द्विजश्रेष्ठ' कहलाता है।
विद्या प्राप्त कर लेने पर 'विप्र' कहलाता है।
इन तीनाें नामाें से युक्त हुआ ब्राह्मण 'श्राेत्रिय' कहा जाता है।
( नोट: "जन्मने जायते शूद्र:" वाला श्लोक फ़र्ज़ी है)
जिस श्लोक को अपने फर्जी कहा क्या पुराण फर्जी हैं, कृप्या समाधान करे
We are Back, Now We shall be active.!
12/07/2024
अंग्रेज़ों की क़ैद में क्रांतिकारी रामलाल तिवारी, जिन्हें बाद में सूली पर लटका दिया गया, न जाने ऐसे वीर ब्राह्मण सपूत में हंसते हंसते सूली पर चढ़े है,
सैल्यूट
08/07/2024
वीर सावरकर की ऐतिहासिक छलांग / इतिहास स्मृति - 8 जुलाई
अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये भारत के स्वाधीनता संग्राम में वीर विनायक दामोदर सावरकर का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर देश ही नहीं, तो विदेश में भी क्रांतिकारियों को तैयार किया। इससे अंग्रेजों की नाक में दम हो गया। अतः ब्रिटिश शासन ने उन्हें लंदन में गिरफ्तार कर मोरिया नामक पानी के जहाज से मुंबई भेजा, जिससे उन पर भारत में मुकदमा चलाकर दंड दिया जा सके।
पर सावरकर बहुत जीवट के व्यक्ति थे। उन्होंने ब्रिटेन में ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अध्ययन किया था। 8 जुलाई, 1910 को जब वह जहाज फ्रांस के मार्सेलिस बंदरगाह के पास लंगर डाले खड़ा था, तो उन्होंने एक साहसिक निर्णय लेकर जहाज के सुरक्षाकर्मी से शौच जाने की अनुमति मांगी।
अनुमति पाकर वे शौचालय में घुस गये तथा अपने कपड़ों से दरवाजे के शीशे को ढककर दरवाजा अंदर से अच्छी तरह बंद कर लिया। शौचालय से एक रोशनदान खुले समुद्र की ओर खुलता था। सावरकर ने रोशनदान और अपने शरीर के आकार का सटीक अनुमान किया और समुद्र में छलांग लगा दी।
बहुत देर होने पर सुरक्षाकर्मी ने दरवाजा पीटा और कुछ उत्तर न आने पर दरवाजा तोड़ दिया; पर तब तक तो पंछी उड़ चुका था। सुरक्षाकर्मी ने समुद्र की ओर देखा, तो पाया कि सावरकर तैरते हुए फ्रांस के तट की ओर बढ़ रहे हैं। उसने शोर मचाकर अपने साथियों को बुलाया और गोलियां चलानी शुरू कर दीं।
कुछ सैनिक एक छोटी नौका लेकर उनका पीछा करने लगे; पर सावरकर उनकी चिन्ता न करते हुए तेजी से तैरते हुए उस बंदरगाह पर पहुंच गये। उन्होंने स्वयं को फ्रांसीसी पुलिस के हवाले कर वहां राजनीतिक शरण मांगी। अंतरराष्ट्रीय कानून का जानकार होने के कारण उन्हें मालूम था कि उन्होंने फ्रांस में कोई अपराध नहीं किया है, इसलिए फ्रांस की पुलिस उन्हें गिरफ्तार तो कर सकती है; पर किसी अन्य देश की पुलिस को नहीं सौंप सकती। इसलिए उन्होंने यह साहसी पग उठाया था। उन्होंने फ्रांस के तट पर पहुंच कर स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। तब तक ब्रिटिश पुलिसकर्मी भी वहां पहुंच गये और उन्होंने अपना बंदी वापस मांगा।
सावरकर ने अंतरराष्ट्रीय कानून की जानकारी फ्रांसीसी पुलिस को दी। बिना अनुमति किसी दूसरे देश के नागरिकों का फ्रांस की धरती पर उतरना भी अपराध था; पर दुर्भाग्य से फ्रांस की पुलिस दबाव में आ गयी। उन्होंने सावरकर को ब्रिटिश पुलिस को सौंप दिया। उन्हें कठोर पहरे में वापस जहाज पर ले जाकर हथकड़ी और बेड़ियों में कस दिया गया। मुंबई पहुंचकर उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसमें उन्हें 50 वर्ष काले पानी की सजा दी गयी। अपने प्रयास में असफल होने पर भी वीर सावरकर की इस छलांग का ऐतिहासिक महत्व है। इससे भारत की गुलामी वैश्विक चर्चा का विषय बन गयी।
06/07/2024
Mukherjee
भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी - जन्म जयंती 6 जुलाई 1901
भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे।
- 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने समाजसेवा करने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया।
-जिस समय मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था और साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी, तब डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा नहीं हो।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी धर्म के आधार पर विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वह मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी।
-महात्मा गांधी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए। उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मन्त्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से उनके मतभेद बराबर बने रहे इसलिए उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था। अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की गयी।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू-कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था।
-संसद में अपने भाषण में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा।
-डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।
03/07/2024
*परमवीर चक्र कैप्टन मनोज पांडे बलिदान दिवस*
- 3 जुलाई, 1999
कैप्टन मनोज पांडे की कारगिल युद्ध मे वीरता दिखाने की वीरगाथा और 2 व् 3 जुलाई की मध्य रात्रि में अधम्य जोश से "खालुबार" की पहाडीयों को फिर से हासिल करने का ब्यौरा अभूतपूर्व है. उनके प्राण न्योछावर में भी गौरव की अनुभूति थी क्योकि उनकी रायफल का निशान दुश्मन के बंकर थे, बर्फ में उनकी जमी हुई अंगुलियाँ रायफल के ट्रीगर को लगातार दबा रही थी.
एन.डी.ए. के भूतपूर्व प्रशिक्षार्थी रहे कैप्टन मनोज को 1/11 गोरखा रायफल में जून 1997 में कमीशन प्राप्त हुआ. कैप्टन मनोज ने कारगिल युद्ध के समय ऑपरेशन विजय के दौरान प्लाटून कमांड की जिम्मेदारी संभाली और बटालिक सेक्टर की खालुबार पहाडियों की ओर बढ़ते रहे.
उन्होंने सांग्रामिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण जुबार टॉप को वापस हासिल करने में 3 जुलाई 1999 को बड़े सवेरे अपने जवानों का बड़ी कुशलता से नेतृत्व किया. ऊँची पर्वत श्रेणियो पर बटालियन के विजय पथ की तरफ बढ़ते कदमो को दुश्मन ने मोर्चाबंदी कर रोकने की कोशिश की पर निर्भीक कैप्टन पांडे अपने लक्ष्य की और कदम बढ़ाते गये. अदम्य साहस दिखाते हुए वे अपने जवानों की टोली से बहुत आगे निकल चुके थे और गोलियों की बौछार करते हुए वीरतापूर्वक दुश्मन का सर्व विनाश करते रहे.
उनके कंधे और पैर बुरी तरह जख्मी होने के बावजूद वे अकेले ही अपने उत्कृष्ट साहस को दिखाते हुए दुश्मन के छक्के छुडाते रहे और एक के बाद एक बंकर पर जीत हासिल करते रहे. खून से लथपथ और लहूलूहान होने के बावजूद कैप्टन मनोज पांडे ने 3 जुलाई – 1999 को वीरगति को प्राप्त करने से पहले दुश्मन के अंतिम बंकर को भी धराशायी कर उनका सर्वनाश किया.
उनके अंतिम शब्द थे “ना छोड़नु” उनको मत छोड़ो.
भारत माँ के इस वीर सपूत को मरणोत्तर परमवीर चक्र प्रदान किया गया.