Denobili School ,mugma

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This page is for the Ex Students Denobili School Mugma. This school had immensely contributed in the education of this belt.

Many schools of this locality still follow the pedagogy of DNS.

04/06/2026
02/06/2026

1995 DENOBILI SCHOOL MUGMA

30/05/2026

रेल चली छुक-छुक / अजय जनमेजय

रेल चली छुक-छुक,
रेल चली छुक-छुक!

रेल में थे नाना,
साथ लिए खाना।
खाना खाया चुप-चुप,
रेल चली छुक-छुक!

रेल में थी दादी,
बिल्कुल सीधी-सादी।
देख रही टुक-टुक,
रेल चली छुक-छुक!

रेल में थी मुनिया,
देखने को दुनिया।
दिल करे धुक-धुक,
रेल चली छुक-छुक!

30/05/2026

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30/05/2026

समर शेष है
- रामधारी सिंह दिनकर

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो
किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्नि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूँ किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले!
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।

वह संसार जहाँ पर पहुँची अब तक नहीं किरण है,
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर-वरण है।
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तस्तल हिलता है,
माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज,
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में?

समर शेष है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,
और नहीं तो तुझ पर पापिनि! महावज्र टूटेगा।

30/05/2026

प्रतिबद्ध

नागार्जुन

प्रतिबद्ध हूँ
संबद्ध हूँ

आबद्ध हूँ
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ—

बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त...
संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ...

अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के ख़िलाफ़…
अंध-बधिर ‘व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए...

अपने आपको भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने की ख़ातिर...
प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ!

संबद्ध हूँ, जी हाँ, संबद्ध हूँ—
सचर-अचर सृष्टि से…

शीत से, ताप से, धूप से, ओस से, हिमपात से…
राग से, द्वेष से, क्रोध से, घृणा से, हर्ष से, शोक से, उमंग से, आक्रोश से...

निश्चय-अनिश्चय से, संशय-भ्रम से, क्रम से, व्यतिक्रम से…
निष्ठा-अनिष्ठा से, आस्था-अनास्था से, संकल्प-विकल्प से…

जीवन से, मृत्यु से, नाश-निर्माण से, शाप-वरदान से...
उत्थान से, पतन से, प्रकाश से, तिमिर से...

दंभ से, मान से, अणु से, महान से…
लघु-लघुतर-लघुतम से, महा-महाविशाल से…

पल-अनुपल से, काल-महाकाल से…
पृथ्वी-पाताल से, ग्रह-उपग्रह से, निहारिका-जल से...

रिक्त से, शून्य से, व्याप्ति-अव्याप्ति-महाव्याप्ति से…
अथ से, इति से, अस्ति से, नास्ति से…

सबसे और किसी से नहीं
और जाने किस-किस से...

संबद्ध हूँ, जी हाँ, शतदा संबद्ध हूँ।
रूप-रस-गंध और स्पर्श से, शब्द से...

नाद से, ध्वनि से, स्वर से, इंगित-आकृति से...
सच से, झूठ से, दोनों की मिलावट से...

विधि से, निषेध से, पुण्य से, पाप से...
उज्ज्वल से, मलिन से, लाभ से, हानि से...

गति से, अगति से, प्रगति से, दुर्गति से…
यश से, कलंक से,

संबद्ध हूँ, जी हाँ, शतदा संबद्ध हूँ!

(नागार्जुन रचना संचयन -पृष्ठ 19)

29/05/2026

Sujit Datta Arnab Chakrabarti Lipa Mohanty Manmohan Singh Shipra Lal Prakash Puspinder Wason

Once upon a time in DNS Mugma a Physics teacher was there. See the Simple life style . He is also class 1 gazetted officer of GOI

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