Pratik Ratna

Pratik Ratna

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Faculty of Biology (NEET-UG). Dedicated to life science.

01/09/2025

Read Before You Comment Carelessly

A young girl climbed the terrace of a coaching institute with the intention of ending her life. Thankfully, she was rescued. But what shocked me even more was the reaction on social media—people, including some who proudly call themselves teachers, rushed to label it as “drama” and “blackmail.”

Do you even realize how heartless that sounds? Do you understand the state of mind of someone standing on the edge, ready to jump? At that moment, a person is not seeking attention. They are drowning in hopelessness, feeling trapped, and convinced that life has nothing left to offer. It is not performance—it is pain.

And yet, instead of compassion, people chose mockery. Let’s be honest: if she had taken that final step and never returned, the same people would have posted ‘RIP’ messages and long condolences. What hypocrisy.

• Especially for those who call themselves teachers:
Teaching is not just about completing a syllabus. It comes with a moral duty—to guide, to protect, and to support students. When you dismiss a cry for help as a joke, you send a chilling message to every struggling student: “If you survive, you will be shamed, not supported.”
Do you realize how dangerous that is? Words can heal, but they can also push someone further into despair.

• Our collective responsibility is clear:
• Listen without judgment.
• Show empathy instead of arrogance.
• Offer support, not ridicule.

Mental health struggles are real. Choosing to end one’s life is never a stunt—it is a sign of unbearable pain. And if we as a society, and especially as teachers, fail to understand this, then we are failing the very children who look up to us for guidance.

02/08/2025

एक मौन महामारी जो युवाओं की मानसिक शांति छीन रही है

(एक शिक्षक और मनोविशेषज्ञ की नज़र से)

✍🏻 प्रतीक रत्न

हम सब ने कभी न कभी किसी को इतना अपना बना लिया कि खुद ही भूल गए. वक्त बीतता गया, उस इंसान ने दर्द देना शुरू किया, पर हम उम्मीद के सहारे चिपके रहे — "शायद सब ठीक हो जाए". मगर कभी-कभी कुछ ठीक नहीं होता. जब एक रिश्ता आपकी आँखों में आँसू और दिल में डर भर दे, तो समझ जाइए वह जहर बन चुका है. यह जहर सिर्फ रिश्ते नहीं, आपकी सोच, आत्मविश्वास और पूरी मानसिक सेहत को खोखला कर देता है.

आज के युवा अक्सर ऐसे ही जहरीले रिश्तों में फँस जाते हैं. रोज की लड़ाई, बिना वजह का शक, प्यार के नाम पर कंट्रोल — ये सब धीरे-धीरे उन्हें अंदर से तोड़ देता है. शुरुआत में यह प्यार लगता है, पर आगे चलकर पता चलता है कि हम खुद से ही कटते चले गए.

ये जहर कैसे काम करता है ?
पहले चरण में भावनात्मक थकान घर कर जाती है. छोटी बातें भी बोझ लगने लगती हैं. फिर बेचैनी शुरू होती है — दिल तेजी से धड़कता है, हाथ-पैर ठंडे पड़ जाते हैं, लगता है सब कुछ अनकंट्रोल हो रहा है. धीरे-धीरे व्यक्ति खुद में सिमट जाता है. बात करने का मन नहीं करता, पुराने शौक बेमानी लगते हैं, जिंदगी रुक सी जाती है. अगर इस स्तर पर मदद न ली जाए, तो व्यक्ति पूरी तरह टूट सकता है — जहाँ न उम्मीद बचती है, न हिम्मत.

समाज और कामकाज पर क्या असर पड़ता है ?

ऐसे में इंसान का दिमाग लगातार थका रहता है. ऑफिस में काम पर ध्यान नहीं टिकता. छोटे फैसले लेने में डर लगता है. काम की गुणवत्ता गिरने लगती है. कई बार तो नौकरी तक चली जाती है. सामाजिक जीवन और बुरा हाल होता है. व्यक्ति दोस्तों, रिश्तेदारों से कटने लगता है. गेट-टुगेदर से दूर भागता है. लोग उसे "ज्यादा सोचने वाला", "नाटक करने वाला" या "मूडी" कहकर टाल देते हैं. यही सबसे बड़ी त्रासदी है — जब आप चिल्लाना चाहते हैं, पर दुनिया आपकी आवाज़ को "शोर" समझती है.

अगर आप खुद को डूबता हुआ महसूस करें, तो क्या करें ?

सबसे पहले, यह स्वीकार करें कि आप संघर्ष कर रहे हैं. यह कमजोरी नहीं, साहस है. दूसरा, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें — चाहे वह दोस्त हो, परिवार का सदस्य हो या कोई काउंसलर. तीसरा, खुद को समय दें. रोज 10 मिनट धूप में बैठें, डायरी में अपने मन की बात लिखें, मोबाइल से दूरी बनाएँ. सबसे जरूरी — मदद माँगने में संकोच न करें. एक काउंसलर से बात करना उतना ही सामान्य है जितना डॉक्टर को दिखाना.

छात्र जीवन की अनसुनी पीड़ा

आज के विद्यार्थियों पर दबाव का पहाड़ टूट पड़ा है. अच्छे नंबर, एंट्रेंस एग्जाम, सोशल मीडिया पर एक्टिव दिखना, दोस्तों के साथ तालमेल — इन सब के बीच वे खुद को भूल जाते हैं. एक टेस्ट खराब होते ही लगता है जैसे जीवन खत्म हो गया. दोस्ती में धोखा सालों तक चुभता रहता है. इंस्टाग्राम पर दूसरों की चमकती जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी फीकी लगती है. घरवाले कहते हैं "बस पढ़ाई पर ध्यान दो", पर कोई नहीं पूछता कि दिल में क्या चल रहा है. इसी तनाव से जन्म लेती है — ओवरथिंकिंग, खुद पर शक और भावनात्मक थकावट.

सोशल मीडिया: दिखावे की दुनिया

आजकल रील्स और पोस्ट्स में हर कोई परफेक्ट दिखता है — बेहतरीन बॉडी, शानदार कपल्स, विदेश घूमते लोग. पर यह सब एक "छन्नी" से गुजरा हुआ सच है. असल जिंदगी में ये लोग भी तनाव, अकेलेपन और असुरक्षा से जूझते हैं. मगर जब कोई युवा इन झूठी तस्वीरों को देखता है, तो वह अपनी हकीकत से नफरत करने लगता है. यही इस डिजिटल युग की सबसे बड़ी मार है.

अंतिम बात :

जिंदगी में वक्त ऐसा भी आता है जब हर चीज अंधेरी लगती है. पर याद रखिए — आप किसी की उम्मीदों का बोझ नहीं हैं. न ही किसी जहरीले रिश्ते का शिकार बनने के लिए पैदा हुए हैं। अगर कोई चीज, कोई रिश्ता या कोई आदत आपको अंदर से मार रही है, तो उसे छोड़ देना ही बहादुरी है. आप खुद को बचाने के लायक हैं. थोड़ी देर रुकिए, साँस लीजिए, और खुद से पूछिए — "क्या मैं वाकई उस चीज के लायक हूँ जो मुझे तोड़ रही है?" जवाब हमेशा "नहीं" होगा.

> महत्वपूर्ण संसाधन :
> - राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन : 080-46110007
> - विशेषज्ञ परामर्श: [मनोजल मंच](https://manojal.org/)
> - पढ़ें : डॉ. विकास दिव्यकीर्ति की किताब "दिमाग का दुश्मन: आधुनिक तनाव"

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