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₹72,000 बनाम ₹20,000 : निजी विद्यालय कटघरे में क्यों?

जब मन शांत हो, आत्मा चैन की साँस ले रही हो और घर में सब कुछ कूल कूल हो, तब एक बार गूगल खोलिए और टाइप कीजिए
“बिहार सरकार के विद्यालयों में प्रति बच्चा वार्षिक खर्च”।
रिपोर्ट आपकी आँखें खोल देगी।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बिहार में एक बच्चे पर सालाना खर्च लगभग ₹72,000 आता है।
अब यहीं से असली प्रश्न जन्म लेता है।
यदि ₹72,000 में भी शिक्षा प्रभावी नहीं है, तो ₹20,000 में क्या चमत्कार अपेक्षित है?
अब आइए, उस निजी विद्यालय की बात करें जो किसी वातानुकूलित भवन में नहीं चलता जहाँ स्विमिंग पूल, रोबोटिक्स लैब और विदेशी भ्रमण नहीं होते जहाँ पढ़ते हैं ट्यूशन पढ़ाने वाले, दिहाड़ी मजदूर, ₹5,000 ₹7,000 महीने कमाने वाले अभिभावकों के बच्चे ऐसे साधारण निजी विद्यालय, जो साल भर में ₹20,000 शुल्क लेकर भी पूरी ईमानदारी से बेहतर शिक्षा देने का प्रयास करते हैं।
किताबें ₹3,000 की हैं तो क्या यह अपराध है?
यदि कोई निजी विद्यालय आपके बच्चे के लिए ₹3,000 की किताबों की सूची देता है, तो जरा ठहरकर सोचिए
क्या आपके घर में किसी एक वयस्क का सालाना खर्च ₹3,000 है?
जब बिजली मुफ्त नहीं थी, तब साल भर का बिजली बिल ₹6,000 से कम आता था?

छह महीने ₹30 ₹40 किलो आलू खरीदते हैं, तब महँगाई नहीं दिखती?

मीट, मछली, दवा हर जगह महँगाई गले तक है, पर शिक्षा आते ही सवाल?

₹3,000 को यदि 365 दिनों में बाँट दें, तो
प्रति दिन खर्च आता है ₹8

बताइए, क्या ₹8 प्रतिदिन में भविष्य गढ़ना बहुत महँगा है?

असल जिम्मेदार कौन? निजी विद्यालय या व्यवस्था?

यह समझना आवश्यक है कि निजी विद्यालय किताबें छापते नहीं उनका कोई छापाखाना नहीं

वे वही किताबें खरीदते हैं जो बाजार में उपलब्ध हैं

किताबें मेरठ, दिल्ली या अन्य शहरों में छपती हैं।

छपाई पर नियंत्रण सरकार का है, निजी विद्यालय का नहीं।

यदि सरकार प्रकाशकों की कीमत तय कर दे
वितरण तंत्र को पारदर्शी बना दे
तो एक दिन में किताबों की कीमत कम हो सकती है।

फिर भी कटघरे में खड़ा किया जाता है निजी विद्यालय को।सरकारी स्कूल का विकल्प अगर व्यवहार में नहीं है, तो दोष किसका है?

आज की हकीकत यह है कि आम नागरिक का बच्चा
सरकारी स्कूल में पढ़कर
प्रतियोगी दुनिया में टिक पाए
यह विश्वास समाज में कमजोर हो चुका है।

ऐसे में संसाधन-विहीन निजी विद्यालय
कम शुल्क में
अधिक प्रयास के साथ
शिक्षा बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं

₹72,000 खर्च करने वाली व्यवस्था यदि जवाबदेह नहीं है,
तो ₹20,000 में ईमानदार कोशिश करने वाले को अपराधी ठहराना न्याय नहीं, अन्याय है।

शिक्षा को महँगा नहीं बनाया गया है,उसे महँगा साबित किया जा रहा है।

और यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

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